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Saturday, August 10, 2013

पद्मनाभ की स्तुति करते ,आहुति देते मेरे गीत !

कौन हवन को पूरा करने
कमल, अष्टदल लाएगा ?
अक्षत पुष्प हाथ में लेकर
कौन साथ में  गायेगा  ?
यज्ञ अग्नि में समिधा देने,
कहीं से आयें मेरे मीत !
पद्मनाभ की, स्तुति करते ,आहुति देते मेरे गीत !

तुम्हें देखकर ही लिखने को 
सबसे पहले कलम उठायी !
तुम्हें देखकर ही पहले दिन
जाने क्यों लिख गयी रुबाई !
यार तुम्हारी यादों से ही, 
बार बार रच जाते गीत !
सिर्फ तुम्हारी ही गलियों में,धूम मचाने जाते गीत !

कितनी बार पुरानी यादें
अक्सर चुभती रहती हैं !
बिना कहे भी,कुछ बातें 
कानों में सुनाई पड़ती हैं !
बार बार वो नाम जुबा पर,

लाएं क्यों दीवाने गीत !
कभी न बापस आयेंगे क्षण,चाहें कितने तड़पें गीत !

क्या बतलाये कैसे भूला  
बीते युग की, यादों को !  
जैसे तैसे भुला सका था
अपनी कड़वीं रातों को !
फिर मेरे द्वार पर आकर, 
क्यों मुस्काए तेरी प्रीत !
समझ न आये मुझको लेकिन,आभारी हैं मेरे गीत !

कैसे दिन बीते, मेरे बिन
आँखों आँखों पूंछ लिया !
कभी याद भी आयी मेरी 
बिना कहे ही जान लिया !
चाहा था पर पूंछ न पाया, 
कभी पढ़े हैं मेरे गीत  ?
याद तो मेरी आयी होगी,जब जब देखे होंगे मीत !

जबसे तुमने गीत न गाये ,
तब से पीर और भर आई !
भरी दुपहरी, रूठ गयी हो ,
जैसे पाहुन से, अमराई !
सुबह सबेरे, देख द्वार पर, 
भौचक्के हैं , मेरे गीत !
चेहरे पर मुस्कान देख कर,ढोल बजाते मेरे गीत ! 

रोज रात में कहाँ से आती
मुझे सुलाने, त्यागमयी !
साधारण रंग रूप तुम्हारा
हो कितनी आनंदमयी  ?
बिन तेरे क्यों नींद न आये,
तुम्ही बताओ,मेरे मीत !
आहट पा, रजनीगंधा की , लगें नाचने , मेरे गीत  ! 

मैंने कब बुलवाया तुमको

अपने जख्म दिखाने को !
किसने अपना दर्द बांटना ,
चाहा , मस्त हवाओं को !
मुझे तुम्हारे न मिलने से, 
नहीं शिकायत मेरे मीत !
जब भी याद सुगन्धित होती, चित्र बनाते मेरे गीत ! 

कभी याद आती है मुझको

उन रंगीन फिजाओं की !
तभी याद आ जाती मुझको
उन सुरमई निगाहों की !
प्रथम बार जिस दिन देखा 
था , ठगे रह गए मेरे गीत !
जैसे तुमने नज़र मिलाई , मन गुदगुदी मचाएं गीत !

आज अकेला भौंरा देखा ,
धीमे धीमे, गाते देखा !
काले चेहरे और जोश पर
फूलों को, मुस्काते देखा !
खाते पीते केवल तेरी,
याद दिलाएं ,ये मधु गीत !
झील भरी आँखों में कबसे,डूब चुके हैं ,मेरे गीत ! 

 रत्न जडित आभूषण पहने,

नज़र नहीं रुक पाती है !
क्या दे,तुझको भेंट सुदामा
मेरी व्यथा , सताती है !
रत्नमयी को क्या दे पाऊँ,
यादें   लाये, मेरे गीत !
अगर भेंट स्वीकार करो तो,धूम मचाएं, मेरे गीत ! 

कैसे बंजर में, जल लायें ?

हरियाली और पंछी आयें ?
श्रष्टि सृजन के लिए जरूरी,
गंगा , रेगिस्तान में लायें !
आग और पानी न होते,
कैसे बनते , मेरे गीत !
तेरे मेरे युगल मिलन पर,सारी रात नाचते गीत ! 

अपने घर की तंग गली में !

मैंने कब चाहा बुलवाना ?
जवां उमर की उलझी लट को
मैंने कब चाहा, सुलझाना ?
मगर मानिनी आ ही गयी अब, 
चरण तुम्हारे ,धोते गीत !
स्वागत करते,निज किस्मत पर, मंद मंद मुस्काते गीत ! 

बिन बोले ही , बात करेंगे ,

बिना कहे ही,सब समझेंगे
आज निहारें, इक दूजे को,
नज़रों से ही , बात करेंगे !
ह्रदय पटल पर चित्र बनाएं , 
मौका पाकर  मेरे गीत !
स्वप्नमयी को घर में पाकर ,आभारी हैं ,मेरे गीत ! 

कैसे बिना तुम्हारे, घर में

रचना का श्रंगार कर सकूं
रोली,अक्षत हाथ में लेकर
छंदों का सत्कार कर सकूं
कल्याणी स्वागत करने को,
ढफली लेकर आये गीत !
सिर्फ तुम्हारे ही हाथों में,प्यार से सौंपे, अपने  गीत ! 

तेरी ऐसी याद कि मेरी हर

चिट्ठी, बन गयी कहानी !
जिसे, कलम ने तुझे याद कर
लिखा ,वही बन गयी रुबाई !
लगता जैसे महाकाव्य का,
रूप ले रहे,  मेरे गीत !
धीरे धीरे, तेरे दिल में, जगह बनाएं मेरे गीत ! 

इतना दर्द सुनाऊं किसको , कौन समझता मेरे गीत -सतीश सक्सेना

क्या खोया क्या पाया हमने ,
क्या छीना , इन नन्हों से !
क्यों न आज हम खुद से पूंछे
क्या पाया,  इन  राहों  से !
बचपन की मुरझाई आँखें, 
खूब रुलाये , हँसते  गीत !
देख सको तो, आँखें देखें ,अपने शिशु की, मेरे मीत !

अहम् हमारे ने,हमको तो

शक्ति दिलाई , जीने में !
मगर एक मासूम उम्र के,
छिने खिलौने,बचपन में !
इससे बड़ा पाप क्या होगा, 
बच्चों से छीना संगीत !
असुरक्षा बच्चों को देकर,खूब लडे, अज्ञानी गीत  !

हम तो कभी नहीं हँस पाए ,

विधि ने ही कुछ पाठ पढाये !
बच्चों का न , साथ दे पाए ,
इक दूजे को,सबक सिखाये !
पाठ पढ़ाया किसने,किसको,
वाह वाह करते हैं गीत  ?
अपने हाथों शाख काट के,कालिदास, रचते हैं गीत  ? 

अभी समय है,चलो हंसाएं 

हम अपनी, मुस्कानों को 
तुम आँचल की छाया दे दो
मैं कुछ लाऊँ, भोजन को !
नित्य रोज घर उजड़े देखें , 
तड़प तड़प, रह जाए प्रीत !
इतना दर्द, सुनाऊं किसको ,कौन समझता, मेरे गीत !

एक बार देखो , दर्पण में ,

खुद से ही कुछ बात करो
जीवन भर का लेखा जोखा
जोड़ के , सारी बात करो !
खाना पीना और सो जाना,
जीवन से यह कैसी प्रीत ?
मरते दम तक, साथ निभाएं,कहाँ से लायें ऐसे मीत  ?

विश्वविजय का निश्चय करके,निकले दिल से मेरे गीत

जब भी कभी घोंसला नोचा,
अपने ही घर  वालों   ने  !
तब तब आश्रय दिया मुझे
कुछ, हंसों के दरवाजे ने  !
चूजों  तक ने सेवा की थी,
जब मुरझाये थे ये गीत !
कभी न, वे दिन भुला सकेंगे, आभारी हैं मेरे गीत ! 

याद खूब अपमान, अश्रु का
जिसे देख,कुछ लोग हँसे थे
सिर्फ तुम्हारी ही आँखों से ,
दो दो आंसू , साथ बहे थे  !
उन्ही दिनों लेखनी उठी थी,
अश्रु पोंछ कर,लिखने गीत !
विश्वविजय का निश्चय करके,निकले दिल से मेरे गीत !

दावानल के समय हमेशा
रिमझिम वारिश होती है !
जलती लपटों के समीप
जल भरी गुफाएं होती हैं !
शीतल आश्रय आगे आते, 
जब जब, झुलसे मेरे गीत !
चन्दन लेप लगा ममता ने, खूब सुलाए, घायल गीत ! 

हर खतरे में साथ रहे थे,
हर आंसू के साथ बहे थे
जब भी जलते तलुए मेरे
तुमने अपने हाथ रखे थे !
ऐसे प्यारों के कारण ही,
जीवन में लगता संगीत !
इनकी धीमी सी आहट से ,निर्झर झरते मेरे गीत ! 

धोखे की इस दुनियां में ,
कुछ प्यारे बन्दे रहते हैं !
ऊपर से साधारण लगते
कुछ दिलवाले, रहते हैं !
दोनों हाथ सहारा देते ,
जब भी ज़ख़्मी,देखे गीत !
अगर न ऐसे कंधे मिलते, कहाँ सिसकते मेरे गीत ! 

घायल हो हो कर पहचानें , गद्दारों को मेरे गीत -सतीश सक्सेना

कितने लोग मिले जीवन में
जिनके पैर पड़े थे, छाले !
रोते थे हिचकी, ले लेकर
उनको घर में दिए सहारे !
प्यार और अहसान न माने,
बड़े लालची थे, वे मीत !
घायल हो हो  कर पहचानें ,गद्दारों को, मेरे गीत !

चंद दिनों में दौलत पाकर

डींग  मारते , भड़क  रहे !
चंद तालियों को सुन कर ,
ही खुद को राजा मान रहे !
प्रजा समझ कर जिसे रुलाया,
वही करेगी इनको ठीक !
कुछ वर्षो के बाद,  इन्हीं  पर, खूब  हँसेंगे,  मेरे गीत  !

दम भरते हैं,धर्मराज का

करते काम, कसाई का !
पूरे दिन,मृदु वचन सुनाएँ 
रात को रूप, शराबी का !
कुछ दिन में जनता सीखेगी,
ध्यान से पढने, मेरे गीत !
बड़ी दुर्दशा, नेता झेलें  , जिस दिन जागें,  मेरे गीत  !

माल कमाने को निकले हैं 

देशभक्ति का झंडा लेकर  
प्रजातंत्र में, नेता निकले 
राजनीति का डंडा लेकर !
खूब बनायें मूर्ख देश को,
अनपढ़ प्रजा,सुन रही गीत !
पतन देख कर,राजनीति का,भौचक्के हैं, मेरे  गीत !

चोर उचक्के, रखवालों को
थप्पड़ भरे, बाज़ार मारते !
सच्चे लोगों को, समाज में
जीभर के अपमानित करते
चोरों को अध्यक्ष बनाएँ , 

सरे आम, पिटते जनगीत !
न्यायाधीश बनाकर इनको, क्यों पछ्ताएं मेरे गीत ?

बहुमत का फायदा उठाते
जमकर गुंडा राज चलाते
वोट दिलाया जिन गुंडों ने
उनके सर पर हाथ फिराते
नफरत और अन्याय देखकर,

अक्सर रोये , मेरे गीत !
तब तब कलम उठी अंगडाई लेकर लिखने, मेरे गीत !

जबतक जातिवाद पनपेगा
देश को यूँ ही रोना होगा !
जब तक जनता डरी रहेगी
इन लाशों को ढोना होगा !
कब तक जनता पहचानेगी 

अपनी ताकत अपनी जीत !
धीरे धीरे समझ आ रही , मुखर हो रहे हैं , जनगीत !

बेईमानों के चेहरों की कुछ
कुछ पहचान सामने आयी !
नकली चेहरों की नौटंकी ,
धीरे धीरे समझ तो आयी !
राजनीति ही आसानी से 

धन दिलवाये समझे गीत !
रंगमंच पर नाटक करते , कैसे प्यार सिखाएं गीत !

अनपढ़ जनता आसानी से
इनके बहकावे में आये !
जाति,धर्म की कसमें खाते
केवल वोट, बटोरें जाएँ !
सदबुद्धि जनता पा जाये,

लोकतंत्र की होगी जीत !
सरस्वती की करें वन्दना, चिंतित रहते मेरे गीत !


भुला के वादे,निश्छल दिल से,शर्मिन्दा हैं,मेरे गीत !

पता नहीं,कुल साँसे अपनी
हम  खरीद  कर , लाये हैं !
कल का सूरज नहीं दिखेगा
आज  समझ , ना  पाए हैं !
भरी वेदना, मन में लेकर , 
कैसे समझ  सकेंगे   प्रीत  ?
मूरखमन फिर चैन न पाए,जीवन भर अकुलायें गीत ! 

जीवन की कुछ भूलें ऐसी ,
याद , आज  भी आती है !
भरी  डबडबाई, वे ऑंखें ,
दिल में कसक जगाती हैं !
जीवन भर के बड़े वायदे , 
सपने खूब दिखाए मीत !
भुला के वादे,निश्छल दिल से,शर्मिन्दा हैं,मेरे गीत ! 

याद  रहे , वे निर्मल सपने,
कुछ अपने से,कुछ गैरों से 
दिवा स्वप्न जो हमने देखे
बिखर गए, भंगुर शीशे से 
जीवन भर के कसम वायदे, 
नहीं निभा पाए थे गीत !
अब क्यों यादे, उनकी आयें, क्यों पछताएं मेरे गीत ?

बड़े दिनों से बोझिल मन है 
कर्जा चढ़ा,   संगिनी का !
चलते थे अपराध बोध ले 
मन में क़र्ज़ ,मानिनी का !
दारुण दुःख में साथ निभाएं, 
कहाँ आज हैं,ऐसे मीत !
प्यार के करजे उतर न पायें ,खूब जानते मेरे गीत ! 

जीवन की कडवी यादों को
भावुक मन से भूले कौन ?
जीवन के प्यारे रिश्तों मे
पड़ी गाँठ, सुलझाए कौन ?
गाँठ पड़ी है,कसक रहेगी,
हर दम चुभता रहता तीर !
जानबूझ कर,धोखे देकर, कैसे नज़र झुकाते, गीत ? 
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